पेपर लीक विवाद और जंतरमंतर प्रोटेस्ट के बीच Gen-Z के उभार की BJP सांसद व मंत्री के घर के जेन-ज़ी ही आवाज़ बन गए, क्या ये केंद्रीय सत्ता के लिए सबसे बड़ी चुनौती है?
विशेष राजनीतिक रिपोर्ट | नई दिल्ली
भारतीय राजनीति के इतिहास में जनआंदोलन कई बार सत्ता के समीकरण बदलने के कारण बने हैं, लेकिन दिल्ली के जंतर-मंतर से उठी हालिया ‘Gen-Z’ लहर ने एक बिल्कुल नई और अभूतपूर्व इबारत लिख दी है।
राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक के विरोध में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) की अगुवाई में लगभग 36 दिनों तक चला छात्र आंदोलन आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ समाप्त हो गया।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली बात केवल छात्रों का सड़कों पर उतरना नहीं रही, बल्कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उसके सहयोगी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के अपने ही शीर्ष नेताओं के बच्चों का इस आंदोलन के पक्ष में खड़ा होना रही।
असम से लेकर ओडिशा और उत्तर प्रदेश तक, बीजेपी व एनडीए नेताओं की अगली पीढ़ी ने न केवल सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की, बल्कि सोशल मीडिया के मंचों पर भी तीखे सवाल दागे। इस ‘आंतरिक असंतोष’ ने केंद्र सरकार पर ऐसा अभूतपूर्व नैतिक और राजनीतिक दबाव बनाया, जिसने आखिरकार सरकार को फैसला लेने पर मजबूर कर दिया।
जब घर की चौखट लांघकर सड़कों पर उतरी ‘Gen-Z’
‘Gen-Z’ यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मी वह युवा पीढ़ी, जो सूचना तकनीक के दौर में पली-बढ़ी है और पारम्परिक राजनीतिक घेरेबंदी से परे अपनी सोच रखती है। परीक्षा में धांधली और पेपर लीक के मुद्दे पर जंतर-मंतर पर जमा हुए युवाओं का समर्थन करने में बीजेपी और एनडीए से जुड़े कई प्रभावशाली नेताओं की बेटियां सबसे आगे नजर आईं।
विशेष रूप से तीन प्रमुख चेहरे इस समय भारतीय राजनीति और सोशल मीडिया में चर्चा का मुख्य केंद्र बने हुए हैं:
दिबिसा (असम): असम में बीजेपी के नेतृत्व वाली हिमंता बिस्वा सरमा सरकार में कैबिनेट मंत्री और असम गण परिषद (AGP) के वरिष्ठ नेता केशव महंता की बेटी।
अर्चिता सचिन रहर / अर्चिता सारंगी (ओडिशा): ओडिशा के भुवनेश्वर से बीजेपी की वरिष्ठ सांसद और फायरब्रांड नेता अपराजिता सारंगी की बेटी।
यशस्वी राजे सिंह (उत्तर प्रदेश): उत्तर प्रदेश के फतेहपुर से बीजेपी के दो बार विधायक रहे वरिष्ठ स्थानीय नेता विक्रम सिंह की बेटी।
पारंपरिक तौर पर माना जाता है कि राजनीतिक परिवारों के बच्चे अपनी पार्टी की लाइन का बचाव करते हैं, लेकिन इस आंदोलन में इन तीनों युवतियों ने साबित कर दिया कि जब युवाओं के भविष्य का सवाल हो, तो वे राजनीतिक वफादारियों से ऊपर उठकर फैसले ले सकती हैं।
गुवाहाटी की सड़कों पर असम के मंत्री की बेटी का तीखा विरोध
20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर जब पुलिसिया कार्रवाई हुई—लाठीचार्ज किया गया और आंसू गैस के गोले छोड़े गए—तो उसकी गूंज केवल राजधानी तक सीमित नहीं रही। 23 जुलाई को असम के गुवाहाटी में छात्रों और युवाओं का एक विशाल जत्था सड़कों पर उतर आया। इस विरोध प्रदर्शन की अग्रिम पंक्ति में यूके (यूनाइटेड किंगडम) से उच्च शिक्षा प्राप्त दिबिसा शामिल थीं।
गुवाहाटी की सड़कों पर हुए इस प्रदर्शन के दौरान दिबिसा का एक वीडियो तेजी से वायरल हुआ, जिसमें वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ नारे लगाती और छात्रों के लिए न्याय की मांग करती दिखाई दीं। एक अन्य वीडियो में अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए दिबिसा यह कहते हुए सुना जा सकता है कि
यह बहुत दुखद है और मैं बता नहीं सकती कि जो हिंसा हो रही है, उसे देखकर मुझे कितना बुरा लग रहा है. छात्र शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करना चाहते थे, लेकिन मामला हिंसक हो गया. लाठीचार्ज हुआ, आंसू गैस छोड़े गए, सब कुछ हुआ, लेकिन मैं कहना चाहती हूं कि मुझे उन सभी छात्रों पर बहुत गर्व है जो उस दिन वहा आए और अपनी बहादुरी दिखाई, और उन्होंने ही मुझे प्रेरित किया.
इस घटनाक्रम पर जब असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा से सवाल पूछा गया, तो उन्होंने निजी विचारों और पारिवारिक संबंधों के अंतर को स्पष्ट करने की कोशिश की।
सीएम सरमा ने कहा कि बालिग बच्चों के फैसलों के लिए उनके माता-पिता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने कहा:
बच्चे क्या करते हैं, इसके लिए मैं कैसे जवाबदेह हो सकता हूं? मेरा अपना भाई भी मेरी किसी बात से सहमत नहीं होता. मेरे बच्चे भी मेरी कई बातों से सहमत नहीं होते. अगर कल मेरा बेटा भी कुछ गलत कह दे तो हैरान मत होइएगा. मेरा बेटा भविष्य में वकील बनेगा और हो सकता है कि वह ऐसे लोगों का पक्ष ले जिन्हें मैं पसंद नहीं करता, जब बच्चे बड़े हो जाते हैं और बालिग हो जाते हैं, तो उनके कामों को उनके माता-पिता से नहीं जोड़कर देखा जाना चाहिए, उसने जो कहा वह गलत था, लेकिन इसके लिए हम उस लड़की से बात करेंगे. हम पिता को क्यों परेशान करेंगे?
सोशल मीडिया पर जंग: ओडिशा सांसद की बेटी की बेबाक स्टोरी
उधर ओडिशा में, भुवनेश्वर से बीजेपी सांसद अपराजिता सारंगी की बेटी अर्चिता की इंस्टाग्राम पोस्ट ने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की खबर आते ही अर्चिता ने अपने इंस्टाग्राम पर एक स्टोरी शेयर की, जिसमें छात्रों के संघर्ष और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे का जश्न मनाया गया था।
बात यहीं खत्म नहीं हुई। अर्चिता ने अपनी अगली इंस्टाग्राम स्टोरी में बेहद सख्त लहजे में लिखा:
“और हां, धर्मेंद्र प्रधान के पीए को… जो मेरी मां को मैसेज करके मेरी पिछली स्टोरी डिलीट करने को कहेगा (जैसा कि पहले भी हो चुका है), चिंता मत कीजिए, मैं इसे डिलीट नहीं करूंगी। जय जगन्नाथ! जय हिंद।”
हालांकि, बाद में यह पोस्ट हटा ली गई, लेकिन तब तक इसका स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैल चुका था। मामले के तूल पकड़ने पर सांसद अपराजिता सारंगी को खुद सामने आकर सफाई देनी पड़ी। उन्होंने मीडिया को बताया कि उनकी बेटी दिल्ली में अपने दोस्तों के साथ थी और उसने अनजाने में यह स्टोरी पोस्ट कर दी थी। अपनी गलती का अहसास होने पर उसने इसे खुद हटा दिया।
इसके साथ ही, सांसद अपराजिता सारंगी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर धर्मेंद्र प्रधान के समर्थन में पोस्ट डालते हुए लिखा कि नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देना बड़े साहस का काम है और वे इस कठिन समय में धर्मेंद्र प्रधान के साथ खड़ी हैं। लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अर्चिता की पोस्ट ने उस दबाव की पोल खोल दी जो पार्टी के भीतर महसूस किया जा रहा था।
पूर्व BJP विधायक की बेटी के तीखे बाण
तीसरा प्रमुख विरोध उत्तर प्रदेश से आया, जहां फतेहपुर से दो बार बीजेपी विधायक रहे विक्रम सिंह की बेटी यशस्वी राजे सिंह ने मोर्चा संभाला।
यशस्वी पिछले कई हफ्तों से कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की पोस्ट्स को लगातार रीपोस्ट कर रही थीं। उन्होंने 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर छात्रों के साथ हुई पुलिसिया सख्ती के खिलाफ कई पोस्ट साझा किए।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद यशस्वी ने ‘X’ पर एक बेहद तीखी टिप्पणी करते हुए लिखा कि “अगर एक बात निश्चित रूप से पता है तो वह यह है कि प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस सार्वजनिक हार के बाद प्रतीकात्मक इस्तीफे के बावजूद सबसे ज्यादा प्रतिशोधी होंगे।”
एक पूर्व बीजेपी विधायक की बेटी द्वारा इस तरह का सीधा और आक्रामक हमला यह दर्शाने के लिए काफी था कि युवाओं के भीतर व्यवस्था को लेकर कितना गहरा आक्रोश पनप रहा है।
बीजेपी के लिए क्यों बनी बड़ी चुनौती?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2019 का नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोधी आंदोलन हो या 2020-21 का ऐतिहासिक किसान आंदोलन—सरकार ने उन सभी प्रदर्शनों से अलग तरीके से निपटा था। उस समय सरकार और पार्टी के रणनीतिकारों के लिए उन आंदोलनों को ‘विपक्षी दलों की साजिश’ या ‘वैचारिक विरोधियों की राजनीति’ करार देना आसान था। लेकिन यह Gen-Z आंदोलन पूरी तरह से अलग साबित हुआ।
बीजेपी के ही एक वरिष्ठ नेता ने स्वीकार किया कि यह स्थिति पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील और खतरनाक है। उन्होंने कहा: विरोधियों के विरोध प्रदर्शन की तुलना में यह राजनीतिक रूप से अधिक खतरनाक है। सरकार उन समूहों के आंदोलन को आसानी से पक्षपातपूर्ण बताकर खारिज कर सकती है जिन्हें वह पहले से ही वैचारिक रूप से विरोधी मानती है। लेकिन जब छात्र और युवा और ये मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग के छात्र हैं लामबंद होना शुरू करते हैं, तो सरकार असहमति को केवल बाहरी प्रभाव तक सीमित नहीं रख सकती।”
इस आंदोलन ने बीजेपी के उस मुख्य आधार—शहरी व ग्रामीण मध्यमवर्ग और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले करोड़ों युवाओं—को सीधे प्रभावित किया, जो परंपरागत रूप से पार्टी का मजबूत वोटबैंक माना जाता रहा है। जब पार्टी के अपने नेताओं के घरों के बच्चे ही सरकार की नीतियों के खिलाफ नारे लगाने लगे, तो सरकार के पास इसे केवल ‘विपक्ष का एजेंडा’ कहने का कोई तर्क नहीं बचा।
36 दिनों का संघर्ष और जंतर-मंतर का सन्नाटा
प्रश्नपत्रों की गोपनीयता बनाए रखने में विफलता और प्रतियोगी परीक्षाओं में व्यापक धांधली के आरोपों को लेकर शुरू हुआ यह 36 दिनों का आंदोलन अब एक ऐतिहासिक मोड़ पर पहुंच चुका है। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जहां एक तरफ जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन समाप्त हो गया है और वहां लगी तिरपालें व बैनर हटा दिए गए हैं, वहीं दूसरी तरफ इस आंदोलन ने भारत की भावी राजनीति को एक नई दिशा दे दी है।
आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल सीजेपी संस्थापक अभिजीत दीपके और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक जैसे लोगों ने जिस तरह से मध्यमवर्ग के छात्रों को एकजुट किया, उसने यह साबित कर दिया है कि सोशल मीडिया के दौर में ‘Gen-Z’ को नजरअंदाज करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आत्मघाती हो सकता है।
सत्ता के लिए एक गंभीर चेतावनी
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भले ही सरकार के लिए एक तात्कालिक ‘डेमेज कंट्रोल’ का जरिया बना हो, लेकिन इस आंदोलन ने सत्ताधारी दल के सामने कई गंभीर सवाल छोड़ दिए हैं। बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के नेताओं के बच्चों का इस तरह से अपनी ही सरकार के खिलाफ खड़ा होना यह स्पष्ट संकेत देता है कि देश का युवा अब केवल दलीय निष्ठा या पारिवारिक राजनीतिक पृष्ठभूमि के आधार पर अपनी आंखें बंद रखने को तैयार नहीं है।
यह ‘Gen-Z’ असंतोष यह रेखांकित करता है कि शिक्षा, रोजगार और निष्पक्ष प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे बुनियादी मुद्दों पर युवा पीढ़ी किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगी। जंतर-मंतर पर भले ही आज सन्नाटा पसर गया हो, लेकिन बीजेपी नेताओं के ड्राइंग रूम से लेकर सड़कों तक उठी यह आवाज आने वाले समय में देश की राजनीति के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत मानी जा रही है।