नई दिल्ली:
NEET परीक्षा में कथित गड़बड़ियों और शिक्षा सुधारों की मांग को लेकर जब प्रख्यात पर्यावरणविद सोनम वांगचुक के साथ देशभर के युवा जंतर-मंतर पर जुटे, तो इस प्रदर्शन के बीच एक और चेहरा सबसे प्रमुख बनकर उभरा। वह चेहरा था 25 वर्षीय नेहा बोरा का, जो बिना अन्न-जल ग्रहण किए लगातार 23 दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठी रहीं।
कम चर्चित होने के बावजूद अपने अटूट हौसले, दृढ़ संकल्प और बुलंद आवाज़ के दम पर नेहा बोरा आज देश की छात्र राजनीति का सबसे नया और चर्चित चेहरा बन चुकी हैं। आइए जानते हैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की इस पीएचडी स्कॉलर और छात्र नेता की पूरी कहानी।

23 दिनों की भूख हड़ताल और गिरता स्वास्थ्य: जब हौसले ने दी ताकत
NEET-UG परीक्षा में कथित धांधली और देश की शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त कमियों के खिलाफ जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन अनशन शुरू हुआ था। इस आंदोलन में सोनम वांगचुक के साथ-साथ AISA (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा भी अग्रिम पंक्ति में शामिल थीं।
लगातार 23 दिनों तक चले इस कठिन अनशन का उनके शरीर पर गहरा असर पड़ा:
- वजन में गिरावट: 23 दिनों के अनशन के दौरान उनका वजन लगभग 7.5 किलोग्राम तक घट गया।
- स्वास्थ्य स्थिति: डॉक्टरों के अनुसार, उनका ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल खतरनाक स्तर तक नीचे आ गया था।
- संकल्प पर अडिग: डॉक्टरों और प्रशासन की ओर से बार-बार अस्पताल में भर्ती होने की हिदायत दी गई, लेकिन नेहा ने साफ कर दिया कि जब तक छात्रों की मांगें पूरी नहीं होंगी, वे पीछे नहीं हटेंगी।
पुलिस कार्रवाई और वांगचुक को अस्पताल ले जाने के बाद भी नेहा बोरा अपने सहयोगियों के साथ मोर्चे पर डटी रहीं, जिसके समर्थन में सैकड़ों छात्रों ने अनशनकारियों के चारों ओर मानव श्रृंखला बनाकर उन्हें सुरक्षा दी।
उत्तराखंड के खटीमा से दिल्ली तक का सफर
नेहा बोरा मूल रूप से उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले स्थित छोटे से कस्बे खटीमा की रहने वाली हैं। उनके पिता भारतीय सेना (Army) में सेवारत हैं।
एक सैन्य परिवार में जन्म लेने के कारण नेहा का बचपन देश के अलग-अलग हिस्सों में बीता। वे बताती हैं कि विभिन्न राज्यों में रहने से उन्हें भारत की विविधता और जमीनी समस्याओं को बहुत करीब से समझने का मौका मिला।
“पहाड़ की महिलाओं को अक्सर शांत और सीधा माना जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि विषम परिस्थितियों से लड़ने का असीम साहस उनके भीतर होता है। वही पहाड़ी जिजीविषा और मजबूती आज मेरे संघर्षों में काम आ रही है।”
— नेहा बोरा
शिक्षा, थिएटर और सामाजिक चेतना
नेहा बोरा का सफर सिर्फ छात्र राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि उनका बौद्धिक और सांस्कृतिक आधार भी बेहद मजबूत रहा है:
दिल्ली विश्वविद्यालय (DU): उन्होंने अपनी स्नातक की पढ़ाई डीयू से पूरी की। इसी दौरान वे थिएटर (रंगमंच) से जुड़ीं और नुक्कड़ नाटकों के जरिए सामाजिक मुद्दों पर आवाज उठाने लगीं।
आंबेडकर यूनिवर्सिटी दिल्ली (AUD): यहां से उन्होंने अपनी परास्नातक (MA) की पढ़ाई पूरी की।
जेएनयू (JNU): वर्तमान में वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के ‘स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स’ से ‘थिएटर एंड परफॉरमेंस स्टडीज’ में पीएचडी (PhD) कर रही हैं।
2019 के नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोधी प्रदर्शनों के दौरान उन्होंने आंदोलनों के सामाजिक प्रभाव को गहराई से महसूस किया, जिसने उनके राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण को नई दिशा दी।
परिवार की अलग विचारधारा, फिर भी अपने उसूलों पर कायम
एक सैन्य पृष्ठभूमि वाले परिवार से आने के कारण उनके परिवार के राजनीतिक और सामाजिक विचार नेहा के विचारों से भिन्न हैं। इसके बावजूद, नेहा ने अपनी स्वतंत्र सोच और राजनीतिक राह खुद चुनी।
नेहा का कहना है कि विचारधाराएं अलग हो सकती हैं और उनका परिवार उनके स्वास्थ्य को लेकर हमेशा चिंतित रहता है, लेकिन वे अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं कर सकतीं। उनके अनुसार, लोकतंत्र का असली सौंदर्य यही है कि आप अपने परिवार का सम्मान करते हुए भी अपनी स्वतंत्र सोच और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा सकें।
AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष और युवा नेतृत्व का नया दौर
अपनी वाक्पटुता, सांगठनिक क्षमता और बेबाक भाषण शैली के कारण नेहा बोरा AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद तक पहुंचीं। उनके नेतृत्व में संगठन ने शिक्षा प्रणाली के बाजारीकरण, पेपर लीक, फेलोशिप में देरी और छात्रों के अधिकारों के मुद्दों पर लगातार केंद्र सरकार और प्रशासन को घेरा है।
जंतर-मंतर पर 23 दिनों का यह अनशन सिर्फ NEET परीक्षा के मुद्दे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने पूरे देश के शोधार्थियों, प्रतियोगी छात्रों और युवाओं को एक सूत्र में पिरोने का काम किया है।
नेहा बोरा: भारतीय छात्र आंदोलन का नया अध्याय
नेहा बोरा की यह कहानी केवल एक छात्र नेता के अनशन का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह समकालीन भारत में युवा महिलाओं के सशक्त नेतृत्व की एक मिसाल है। खटीमा की वादियों से लेकर JNU के गलियारों और दिल्ली के जंतर-मंतर तक का उनका यह सफर दिखाता है कि जब जनहित की बात हो, तो इच्छाशक्ति के आगे कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती।