
मुंबई के जसलोक अस्पताल ने पेरिस ब्रेन इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर एक क्रांतिकारी एआई (AI) आधारित प्रोजेक्ट शुरू किया है। यह तकनीक पार्किंसंस के मरीजों में चलने-फिरने में आने वाली अचानक रुकावट (गैट फ्रीजिंग) का पहले ही अनुमान लगा लेगी, जिससे मरीजों को गिरने और गंभीर चोटों से बचाने में मदद मिलेगी।
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जसलोक अस्पताल के डॉक्टर पेरिस ब्रेन इंस्टीट्यूट के सहयोग से एक अत्याधुनिक AI टूल विकसित कर रहे हैं, जो पार्किंसंस के मरीजों में ‘फ्रीजिंग ऑफ गेट’ (चलने में रुकावट) का समय रहते अनुमान लगाएगा।
तस्वीर: पार्किंसंस के लक्षण (फ्रीजिंग ऑफ गेट)- यह तस्वीर एक बुजुर्ग मरीज़ की है जो ‘फ्रीजिंग ऑफ गेट’ का अनुभव कर रहा है—उनके पैर ज़मीन से चिपके हुए महसूस होते हैं, जिससे उनको चलने में कठिनाई हो रही है और गिरने का डर बना हुआ है।
यह लक्षण करीब 80% रोगियों को प्रभावित करता है, जिससे गिरने और चोट लगने का खतरा बढ़ जाता है। डॉ. परेश दोशी के नेतृत्व में बन रहा यह उपकरण कंप्यूटर विज़न और मशीन लर्निंग की मदद से मोबाइल पर रिकॉर्ड किए गए साधारण वीडियो का विश्लेषण करेगा। जिससे महंगे मेडिकल टेस्ट या वियरेबल उपकरणों की आवश्यकता नहीं होगी। अगले दो वर्षों में तैयार होने वाले इस टूल का मुख्य उद्देश्य बीमारी के बढ़ने की गति को पहचानना है, ताकि मरीजों के लिए बेहतर उपचार योजना बनाई जा सके और उनकी आत्मनिर्भरता व गतिशीलता को बरकरार रखा जा सके। यह तकनीक विशेष रूप से कम लागत और सुलभता पर केंद्रित है, जो भारत में पार्किंसंस के बढ़ते मामलों के प्रबंधन में एक बड़ी राहत साबित होगी।
पैर चिपकने की समस्या (Freezing of Gait) का समाधान
पार्किंसंस रोग के एडवांस्ड स्टेज में लगभग 75% से 80% मरीजों को ‘फ्रीजिंग ऑफ गेट’ का सामना करना पड़ता है। इसमें मरीज को ऐसा महसूस होता है जैसे उसके पैर जमीन से जुड़ गए हों, जिससे मुड़ने या चलने में भारी दिक्कत आती है। इस समस्या के कारण मरीज अक्सर अपना संतुलन खो देते हैं और गिर जाते हैं, जिससे उनकी आत्मनिर्भरता खत्म होने लगती है।

तस्वीर: एआई तकनीक का उपयोग (AI for Early Detection)- यहाँ एक परिवार के सदस्य को मोबाइल फोन का उपयोग करके एक मरीज के चलने का वीडियो रिकॉर्ड करते हुए दिखाया गया है। यह प्रदर्शित करता है कि कैसे मोबाइल तकनीक का उपयोग करके मशीन लर्निंग के माध्यम से ‘फ्रीजिंग ऑफ गेट’ का समय रहते पूर्वानुमान लगाया जा सकता है।
विदेशी सहयोग और तकनीक का संगम
विश्व पार्किंसंस दिवस (11 अप्रैल) के अवसर पर, पेडर रोड स्थित जसलोक अस्पताल ने इस प्रोजेक्ट की घोषणा की। यह टूल फ्रांस के पेरिस ब्रेन इंस्टीट्यूट के साथ साझेदारी में विकसित किया जा रहा है। वरिष्ठ न्यूरोसर्जन डॉ. परेश दोषी के नेतृत्व में चलने वाली इस परियोजना को पूरा होने में लगभग दो साल का समय लगेगा।
मोबाइल वीडियो से होगा विश्लेषण
इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत इसकी सुलभता है। जहाँ वर्तमान में चाल के विश्लेषण के लिए करोड़ों रुपये की मशीनों (गेट एनालाइज़र) की जरूरत होती है, वहीं यह एआई टूल:
- कंप्यूटर विज़न और मशीन लर्निंग का उपयोग करेगा।
- मरीज के साधारण मोबाइल फोन से लिए गए वीडियो को स्कैन करेगा।
- शरीर के 35 से अधिक गति बिंदुओं (Movements points) का बारीकी से अध्ययन करेगा।
- संतुलन में आने वाले उन सूक्ष्म बदलावों को पकड़ेगा जिन्हें इंसानी आंखें नहीं देख पातीं।

विकास और अनुसंधान (Developing the AI Tool): इस चित्र में डॉ. परेश दोशी और मुंबई के जसलोक अस्पताल की टीम को पेरिस ब्रेन इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर डेटा और वीडियो पर काम करते हुए दिखाया गया है। यह इस तकनीक के पीछे चल रहे शोध और अनुसंधान को दर्शाता है।
शोध का आधार और भविष्य की योजना
डॉ. दोषी के अनुसार, इस अध्ययन के लिए अस्पताल के पिछले 30 वर्षों के डेटा का उपयोग किया जा रहा है।
- प्रथम चरण: मशीन लर्निंग मॉडल विकसित करने के लिए 400 से अधिक पुराने वीडियो और 150 मरीजों के डेटा का विश्लेषण किया जाएगा।
- द्वितीय चरण: अगले तीन वर्षों तक लगभग 337 मरीजों पर इस मॉडल का परीक्षण (प्रोस्पेक्टिव ट्रायल) किया जाएगा।

बेहतर देखभाल और स्वतंत्रता (Improving Independence): यह चित्र दिखाता है कि कैसे इस एआई तकनीक की मदद से डॉक्टर बेहतर उपचार योजना बना सकते हैं। इससे पार्किंसंस के मरीजों के गिरने का जोखिम कम होता है और उनकी आत्मनिर्भरता व गतिशीलता लंबे समय तक बनी रहती है।
उपचार में कैसे मिलेगी मदद?
चूँकि पार्किंसंस का कोई स्थायी इलाज नहीं है, इसलिए समय रहते इसके लक्षणों का पूर्वानुमान लगाना ही सबसे कारगर तरीका है। यह टूल डॉक्टरों को यह समझने में मदद करेगा कि बीमारी कितनी तेजी से आगे बढ़ेगी। इससे वे पहले ही बेहतर इलाज की योजना बना सकेंगे, जिससे मरीजों का सामाजिक अलगाव, चिंता और गिरने का डर कम किया जा सके।