सुरक्षा बलों और खुफिया एजेंसियों की संयुक्त रणनीति से हुई मिसिर बेसरा उर्फ भास्कर जी की गिरफ्तारी केवल एक शीर्ष नक्सली की पकड़ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूर्वी भारत विशेषकर सारंडा और कोल्हान के जंगलों से माओवादी साम्राज्य के पूर्ण अंत का प्रतीक मानी जा रही है।
रांची/गिरिडीह: झारखंड सरकार की पुनर्वास नीति ने माओवादी संगठन के ‘लोकल इंटेलिजेंस’ और ‘ग्राउंड कैडर’ दोनों को तोड़ दिया है। सुरक्षा बलों के सैन्य दबाव (Operations) और सरकार की इस नीति के संयोजन का ही नतीजा है कि सारंडा, बूढ़ा पहाड़ और पारसनाथ जैसे इलाके आज लगभग नक्सल-मुक्त हो चुके हैं। इसी कड़ी में मिसिर बेसरा उर्फ भास्कर जी की गिरफ्तारी के बाद झारखंड लगभग नक्सल मुक्त हो गया है.
झारखंड में तीन दशकों से लाल आतंक का दूसरा नाम बने कुख्यात माओवादी नेता मिसिर बेसरा उर्फ भास्कर जी की गिरफ्तारी ने देश के नक्सल विरोधी अभियानों में एक नया इतिहास रच दिया है। भारतीय कम्युनिस्ट (माओवादी) की शीर्ष नीति-निर्धारक इकाई ‘पोलित ब्यूरो’ के इस सदस्य पर झारखंड सरकार की ओर से 1 करोड़ रुपये और छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा 1.20 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था।
मिसिर बेसरा बीते कई वर्षों से पश्चिम सिंहभूम के घने सारंडा और कोल्हान के जंगलों को अपना ठिकाना बनाए हुए था। उसे पकड़ने के लिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF), कोबरा (CoBRA), झारखंड जगुआर और इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) की टीमें लगातार काम कर रही थीं।
ठिकाना बदलने की कोशिश बनी सबसे बड़ी भूल
रास्ते की ट्रैकिंग: जब झारखंड पुलिस मुख्यालय में 16 नक्सली एक साथ आत्मसमर्पण कर रहे थे, उस समय मिसिर बेसरा सारंडा के जंगलों से निकलकर धनबाद के राजगंज के रास्ते अपने गृह क्षेत्र गिरिडीह (पारसनाथ/पीरटांड़) की ओर रुख कर रहा था।
ताजा तस्वीर और सटीक लोकेशन: इंटेलिजेंस ब्यूरो और सुरक्षा बलों को उसके धनबाद-गिरिडीह मार्ग पर होने की सटीक जानकारी मिली। साथ ही उसकी एक हालिया तस्वीर से पहचान पुख्ता की गई।
त्वरित घेराबंदी: गिरिडीह सीमा में प्रवेश करने से ठीक पहले सुरक्षा बलों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया। यदि थोड़ी भी देर होती, तो बेसरा पारसनाथ के दुर्गम जंगलों में छिपने में सफल हो जाता।
सहयोगियों और हथियारों की ज़ब्ती
इस त्वरित अभियान में मिसिर बेसरा के अलावा दो अन्य शीर्ष कैडर भी दबोचे गए:
मोछू उर्फ किस्मत (15 लाख रुपये का इनामी नक्सली)
गौरव (मिसिर बेसरा का बेहद करीबी व निजी सुरक्षा दस्ता सदस्य)
मौके से सुरक्षा बलों ने 3 आधुनिक एके-47 (AK-47) राइफलें, सैकड़ों राउंड कारतूस और संगठन से जुड़े कई संवेदनशील दस्तावेज बरामद किए।
मिसिर बेसरा का आपराधिक इतिहास और सांगठनिक कद
मूल रूप से गिरिडीह जिले के पीरटांड़ का रहने वाला मिसिर बेसरा 1980 के दशक के उत्तरार्ध में वामपंथी उग्रवाद से जुड़ा था। साधारण कैडर से शुरू कर वह माओवादी संगठन के सर्वोच्च पायदान ‘पोलित ब्यूरो’ तक पहुंचा।
[साधारण कैडर] ➔ [क्षेत्रीय कमांडर] ➔ [सेंट्रल कमेटी मेंबर] ➔ [पोलित ब्यूरो सदस्य (सर्वोच्च नीति-निर्धारक)]
संगठन में भूमिका और प्रभाव क्षेत्र
माओवादी सैन्य रणनीति: बेसरा को भाकपा (माओवादी) के ‘सैन्य मामलों की समिति’ (Military Commission) का प्रमुख रणनीतिकार माना जाता था। झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में कैडरों को छापामार युद्ध (Guerilla Warfare) का प्रशिक्षण देने और बड़े एम्बुश (घात लगाकर हमले) की योजना बनाने में उसकी मुख्य भूमिका रहती थी।
रेड कॉरिडोर का विस्तार: झारखंड के सारंडा, कोल्हान, पारसनाथ, लुगु पहाड़ और बूढ़ा पहाड़ को माओवादियों का सबसे मजबूत किला बनाने का श्रेय मिसिर बेसरा को ही दिया जाता है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल के जंगलमहल और ओडिशा के सीमावर्ती इलाकों में उसका समानांतर शासन चलता था।
संगीन मामले: उसके खिलाफ झारखंड और छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों में 100 से अधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें:
- सुरक्षा बलों पर जानलेवा एम्बुश और आईईडी (IED) ब्लास्ट की साजिश।
- सरकारी संपत्ति, पुलिस थानों और शस्त्रागारों पर हमले कर हथियार लूटना।
- विकास योजनाओं, खदानों और ठेकेदारों से करोड़ों रुपये की लेवी (रंगदारी) वसूलना।
- मुखबिरी के संदेह में ग्रामीणों की जनअदालत लगाकर हत्याएं करवाना।
पारसनाथ और सारंडा से लाल आतंक का सफाया
झारखंड में नक्सलवाद की रीढ़ गिरिडीह (पारसनाथ) और पश्चिम बंगाल से जुड़े नेटवर्क से चलती थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों ने इस नेटवर्क को जड़ से उखाड़ फेंका है।
| शीर्ष माओवादी नेता | दर्जा / इनाम | वर्तमान स्थिति |
|---|---|---|
| प्रशांत बोस उर्फ किशनदा | पोलित ब्यूरो सदस्य (1 करोड़) | जेल में बंद (पूर्व में गिरफ्तार) |
| अनल दा उर्फ तूफान | सेंट्रल कमेटी सदस्य (1 करोड़) | मुठभेड़ में ढेर |
| मिसिर बेसरा उर्फ भास्कर | पोलित ब्यूरो सदस्य (1 करोड़) | पुलिस हिरासत में |
| असीम मंडल उर्फ आकाश | पोलित ब्यूरो/सेंट्रल कमेटी (1 करोड़) | इकलौता बचा 1 करोड़ का इनामी (पश्चिम बंगाल भागने की फिराक में) |
सारंडा की स्थिति: मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी के साथ ही सारंडा के जंगल से इनामी माओवादियों का दौर खत्म हो गया है। कभी माओवादियों का ‘हेडक्वार्टर’ कहे जाने वाले सारंडा और बूढ़ा पहाड़ को अब पूरी तरह से सुरक्षा बलों ने नक्सल-मुक्त घोषित कर दिया है।
ये सफलता 14 वर्षों की मेहनत का परिणाम
झारखंड पुलिस और केंद्रीय बलों की आक्रामक नीति का ही नतीजा है कि राज्य में अब माओवादी केवल सीमित क्षेत्रों तक सिमट गए हैं।
- 2025 का रिकॉर्ड: सुरक्षा बलों ने 34 उग्रवादियों को मुठभेड़ में मार गिराया था।
- 2026 की सफलताएं: इस वर्ष अब तक 22 से अधिक उग्रवादी ढेर किए जा चुके हैं और दर्जनों मुख्य कैडरों ने सरेंडर किया है।
- वर्तमान चुनौती: अब राज्य में केवल असीम मंडल उर्फ आकाश ही एक करोड़ का इनामी नक्सली बचा है, जो दलमा के रास्ते पश्चिम बंगाल भागने की कोशिश कर रहा है। पुलिस का दावा है कि जल्द ही उसे भी गिरफ्तार या निष्प्रभावी कर दिया जाएगा।
मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी से भाकपा (माओवादी) को ऐसा झटका लगा है, जिससे उबर पाना उनके लिए लगभग असंभव माना जा रहा है।
इस विषय से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को विस्तार से समझें:
सारंडा के घने जंगल माओवादियों के लिए तीन दशकों तक इतने सुरक्षित ठिकाने क्यों बने रहे? इसका भौगोलिक और रणनीतिक इतिहास बताएं।
सारंडा फॉरेस्ट
सारंडा फॉरेस्ट का विशाल भूभाग दशकों तक माओवादियों (भाकपा-माओवादी) के लिए अभेद्य किला बना रहा। 820 वर्ग किलोमीटर में फैला और एशिया का सबसे बड़ा ‘साल’ (Sal) वृक्षों का जंगल माना जाने वाला यह क्षेत्र माओवादियों के ‘सेंट्रल हेडक्वार्टर’ और ट्रेनिंग ग्राउंड के रूप में जाना जाता था।
सारंडा के लगभग तीन दशकों तक माओवादियों का सबसे सुरक्षित ठिकाना बने रहने के पीछे निम्नलिखित भौगोलिक, रणनीतिक, और सामाजिक-आर्थिक कारण जिम्मेदार थे:
भौगोलिक विषमता और प्राकृतिक सुरक्षा
- 700 पहाड़ियों का इलाका: स्थानीय ‘हो’ भाषा में ‘सारंडा’ का अर्थ होता है – “700 पहाड़ियों की भूमि”। यहाँ का स्थलाकृति (Terrain) अत्यंत दुर्गम, उबड़-खाबड़ और गहरी घाटियों से भरा है।
- सूरज की रोशनी न पहुंचना: साल वृक्षों की सघनता इतनी अधिक है कि कई अंदरूनी इलाकों में दिन के समय भी जमीन तक सूरज की रोशनी पूरी तरह नहीं पहुंच पाती। इस प्राकृतिक छत्र (Canopy) के कारण उपग्रह (Satellite) छवियों या हवाई ड्रोन कैमरों से जंगल के अंदर की गतिविधियों को देखना लगभग असंभव था।
- सड़क और नेटवर्क का अभाव: जंगल के भीतर पक्की सड़कों का नामोनिशान नहीं था। सुरक्षा बलों के वाहनों का अंदर प्रवेश करना नामुमकिन था, जिससे पैदल गश्त (Foot Patrol) ही एकमात्र विकल्प बचता था।
रणनीतिक राज्य-सीमा (Tri-Junction Location)
सारंडा का भूगोल अंतर-राज्यीय सीमा का लाभ उठाने के लिए आदर्श था:
- सुरक्षित भागने का रास्ता: सारंडा का जंगल झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले से सटकर ओडिशा (केओंझर व सुंदरगढ़) और छत्तीसगढ़ की सीमाओं को जोड़ता है।
- कानून-व्यवस्था का फायदा: जब भी झारखंड पुलिस या केंद्रीय सुरक्षा बल (CRPF) कोई बड़ा अभियान चलाते, तो माओवादी आसानी से सीमा पार करके ओडिशा या छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में शरण ले लेते थे। अंतर-राज्यीय पुलिस समन्वय में देरी का फायदा हमेशा नक्सलियों को मिलता था।
‘आईईडी’ (IED) का जाल और बारूदी सुरक्षा कवच
माओवादियों ने सारंडा को एक ‘किले’ में बदल दिया था:
- माइनफील्ड्स का निर्माण: जंगल के मुख्य रास्तों, पगडंडियों और सरकारी इमारतों/स्कूलों के आसपास माओवादियों ने बड़े पैमाने पर लैंडमाइंस और आईईडी (Improvised Explosive Devices) बिछा रखे थे।
- सर्च ऑपरेशन में बाधा: भारी लैंडमाइंस के खतरे के कारण सुरक्षा बल बेहद सतर्क और धीमी गति से आगे बढ़ते थे, जिससे माओवादी समय रहते जंगल में कहीं और शिफ्ट हो जाते थे।
प्रशासनिक शून्यता और सामाजिक-आर्थिक कारक
- मूलभूत सुविधाओं की कमी: दशकों तक इस इलाके में स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, बिजली और बुनियादी ढांचे का अभाव रहा।
- आदिवासी आबादी और समर्थन: सारंडा में मुख्य रूप से ‘हो’ और ‘मुंडा’ आदिवासी समुदाय रहते हैं। सरकारी तंत्र की अनुपस्थिति के कारण माओवादियों ने यहाँ अपनी ‘जनअदालत’ और समानांतर प्रशासन शुरू कर दिया। उन्होंने आदिवासियों को जंगल पर अधिकार का झांसा देकर उनका कैडर के रूप में इस्तेमाल किया और स्थानीय मुखबिरी (Local Intelligence) का मजबूत ढांचा खड़ा किया।
प्राकृतिक संसाधनों से लेवी (रंगदारी) वसूली
- लौह अयस्क (Iron Ore) का गढ़: सारंडा क्षेत्र भारत के सबसे बड़े लौह अयस्क भंडारों में से एक है, जहाँ सैल (SAIL) और कई निजी खनन कंपनियाँ कार्यरत हैं।
- आर्थिक मजबूती: माओवादी यहाँ ठेकेदारों, खनन कारोबारियों, और ट्रांसपोर्टरों से हर साल करोड़ों रुपये की रंगदारी (लेवी) वसूलते थे। इस भारी वित्तीय संसाधन का उपयोग वे आधुनिक हथियार (जैसे एके-47) खरीदने और अपने संगठन को मजबूत करने में करते थे।
बदलावा की शुरुआत और वर्तमान स्थिति
2011 के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय और झारखंड सरकार ने ‘ऑपरेशन एनाकोंडा’ और ‘ऑपरेशन विकास’ चलाकर सारंडा के मुख्य प्रशासनिक केंद्रों में सुरक्षा कैंप स्थापित किए। ‘सारंडा विकास योजना’ के तहत सड़कों और संचार नेटवर्क का विस्तार किया गया।
हाल ही में शीर्ष रणनीतिकार मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी और उससे पहले कई कमांडरों के सरेंडर के बाद अब सारंडा से माओवादियों का प्रभाव पूरी तरह समाप्त माना जा रहा है।
झारखंड में आत्मसमर्पण नीति (Surrender Policy) के नियम समझें
झारखंड सरकार की नक्सली आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति (Surrender and Rehabilitation Policy) क्या है और यह कितनी सफल रही है?
झारखंड सरकार की ‘नई दिशा’ आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति (Surrender and Rehabilitation Policy) राज्य में नक्सलवाद के उन्मूलन, सशस्त्र कैडरों को हिंसा का रास्ता छुड़ाने और उन्हें समाज की मुख्यधारा में वापस लाने के लिए तैयार की गई एक बहुआयामी नीति है।
यह नीति “हथियार छोड़ो, सम्मान से जियो” के सिद्धांत पर काम करती है और बंदूक के बल के बजाय सामाजिक-आर्थिक सहायता के जरिए माओवादियों के नेटवर्क को कमजोर करने में बेहद प्रभावी साबित हुई है।
नीति की प्रमुख विशेषताएं एवं मिलने वाले लाभ
यह नीति आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली के पद और उसके द्वारा समर्पित हथियारों के आधार पर वित्तीय और सामाजिक सहायता प्रदान करती है:
एकमुश्त वित्तीय अनुदान (Financial Grant)
- श्रेणी-A (जोनल कमांडर और उससे ऊपर): आत्मसमर्पण करने पर 5 लाख रुपये की सहायता (1 लाख तुरंत तथा शेष राशि किस्तों में बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट के रूप में)।
- श्रेणी-B (जोनल कमांडर से नीचे): 2.5 लाख रुपये की सहायता राशि।
घोषित इनाम का भुगतान
- यदि आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली पर सरकार की ओर से कोई इनाम (जैसे 5 लाख, 10 लाख, या 15 लाख रुपये) घोषित था, तो वह पूरी इनाम राशि सीधे उसी आत्मसमर्पित नक्सली को दे दी जाती है।
हथियारों के समर्पण पर अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि
समर्पित किए गए हथियारों के प्रकार के आधार पर अतिरिक्त राशि दी जाती है:
- एलएमजी / रॉकेट लॉन्चर / एके-47 / इंसास: ₹75,000 से ₹1,000,000 तक।
- पिस्तौल / रिवॉल्वर: ₹15,000 – ₹25,000.
- आईईडी / वाकी-टॉकी / वायरलेस सेट: प्रकार के अनुसार ₹2,000 से ₹10,000 तक।
पुनर्वास, शिक्षा और आवास लाभ
- व्यावसायिक प्रशिक्षण: आत्मसमर्पित नक्सलियों को 1 से 3 वर्षों तक उनकी रुचि का व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाता है और इस दौरान ₹3,000 से ₹5,000 प्रति माह का वजीफा (Stipend) मिलता है।
- आवास और जमीन: अपना घर बनाने के लिए 4 डेसिमल जमीन और मकान निर्माण हेतु वित्तीय सहायता।
- बच्चों की शिक्षा: बच्चों की स्कूली और उच्च शिक्षा (स्नातक तक) के लिए सालाना ₹25,000 तक की सहायता।
- कानूनी सहायता: मुकदमों (Court Cases) के निपटारे के लिए सरकारी वकील और मुकदमों की वापसी / रियायत की प्रक्रिया (‘प्ली बार्गेनिंग’) में मदद।
नीति कितनी सफल रही है?
झारखंड की आत्मसमर्पण नीति को देश की सबसे सफल एंटी-नक्सल नीतियों में से एक माना जाता है। इसके मुख्य परिणाम इस प्रकार हैं:
शीर्ष और मध्य-स्तरीय कमांडरों का मोहभंग
सुरक्षा बलों की आक्रामक कार्रवाई (Operation Navjeevan) और इस नीति के आकर्षक प्रावधानों के कारण भाकपा (माओवादी) का सांगठनिक ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है।
- बड़े कैडर का सरेंडर: हाल के महीनों में 15-15 लाख और 10-10 लाख के इनामी नक्सलियों (जैसे क्षेत्रीय कमेटी सदस्य संतोष उर्फ बासुदेव दा, चंदन लोहरा आदि) ने सामूहिक रूप से आत्मसमर्पण किया है।
हालिया आंकड़े (2025-2026 की सफलता
- केवल मई 2026 में ‘ऑपरेशन नवजीवन’ के तहत 27 नक्सलियों/उग्रवादियों ने एक साथ हथियार डाले।
- जुलाई 2026 में ही 16 बड़े नक्सलियों ने एक साथ आत्मसमर्पण किया और 11 आधुनिक हथियार (एके-47, इंसास आदि) जमा कराए।
- 2025 और 2026 के बीच 100 से अधिक सक्रिय नक्सलियों ने मुख्यधारा का रास्ता चुना है।
कैडर भर्ती में भारी गिरावट
पहले जो युवा माओवादियों के बहकावे में आकर जंगलों का रुख करते थे, उन्हें अब यह साफ दिखने लगा है कि हिंसा के रास्ते में केवल मौत या जेल है, जबकि आत्मसमर्पण नीति के तहत उन्हें जमीन, पैसा, घर और बच्चों के लिए सम्मानजनक भविष्य मिल रहा है।
Gemini is AI and can make mistakes.