बलिया (उत्तर प्रदेश):
हर सुबह जब रानीपुर गांव की गलियों में बच्चे हाथों में बैग थामे खिलखिलाते हुए स्कूल की ओर बढ़ते हैं, तो 7 साल की एक नन्ही सी बच्ची अपने घर की देहली पर खड़ी होकर सिर्फ उन्हें देखा करती थी। आँखों में आँसू और दिल में बस एक ही जिद—“मुझे भी पढ़ना है।”
यह कहानी है बलिया जिले के मनियर ब्लॉक स्थित रानीपुर गांव की रागिनी की, जिसने महज़ 6 महीने की उम्र में एक दर्दनाक सड़क हादसे में अपना एक पैर पूरी तरह गंवा दिया था। पिता मजदूरी करते हैं और माँ बबीता देवी, गरीबी के कारण कभी इतना पैसा नहीं जुटा सकीं कि रागिनी का सही इलाज करा पाते या उसे कृत्रिम पैर दिलवा पाते।
लेकिन कुदरत के इस क्रूर मज़ाक के आगे इस मासूम के हौसले ने घुटने नहीं टेके। रागिनी ने हिम्मत नहीं हारी और एक ही पैर से कूद-कूदकर प्राथमिक विद्यालय दिघेड़ा जाना शुरू कर दिया।
400 मीटर का रास्ता, जो बन गया 400 किलोमीटर की जंग
रागिनी के घर से उसका स्कूल महज 400 मीटर की दूरी पर है। एक सामान्य बच्चे के लिए यह 5 मिनट का रास्ता है, लेकिन एक पैर पर छलांग लगाते हुए जाने वाली रागिनी के लिए यह सफर किसी तपस्या से कम नहीं था।
गाँव की उबड़-खाबड़ और जर्जर सड़कों पर जब वह थक जाती, तो बीच रास्ते में ही ज़मीन पर बैठकर फूट-फूटकर रोने लगती। कई बार गिरती, चोट खाती, फिर खुद को संभालती और आँखों के आँसू पोंछकर फिर से स्कूल की ओर कदम बढ़ा देती। उसके जज्बे ने स्कूल के शिक्षकों और ग्रामीणों के दिलों को झकझोर कर रख दिया।
“DM अंकल, मुझे एक ट्राईसाइकिल दे दीजिए…”
जब इस मासूम का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, तो उसकी एक मासूम सी पुकार पूरे देश तक पहुँची—“डीएम अंकल, मुझे एक ट्राईसाइकिल दे दीजिए, मैं उससे रोज स्कूल जाऊंगी।”
मासूम की यह गुहार जब बलिया के प्रशासनिक गलियारों में गूंजी, तो तंत्र की नींद खुली।
बलिया के जिलाधिकारी (DM) मंगला प्रसाद सिंह अधिकारियों और डॉक्टरों की टीम के साथ खुद रागिनी के मिट्टी के घर पहुँचे। डीएम ने रागिनी को सिर्फ प्यार और दुलार ही नहीं दिया, बल्कि उसके हाथों में नई ट्राईसाइकिल, स्कूल का बैग, किताबें, खिलौने और चॉकलेट्स भी सौंपीं।
अब न रुकेगी पढ़ाई, न टूटेगा सपना
प्रशासन ने रागिनी की शिक्षा, पेंशन, घर में शौचालय निर्माण और उसके पैर के बेहतर डॉक्टरी इलाज की पूरी जिम्मेदारी ली है। साथ ही, जिस जर्जर रास्ते पर वह रोज गिरती थी, उस सड़क की मरम्मत के भी आदेश दिए गए हैं।
हादसे ने भले ही रागिनी से उसका एक पैर छीन लिया हो, लेकिन उसकी आँखों में तैरते सपनों को नहीं छीन सका। आज जब रागिनी अपनी नई ट्राईसाइकिल पर बैठकर स्कूल के रास्ते पर निकलती है, तो उसके चेहरे की मुस्कान पूरे समाज को यह संदेश देती है—“उड़ान पंखों से नहीं, हौसलों से होती है।”