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अमेरिका-ईरान युद्धविराम को इसराइल की मंज़ूरी के बाद नेतन्याहू के दावों का क्या?

अमेरिका और ईरान के बीच पांच हफ्तों तक चले संघर्ष के बाद युद्धविराम लागू हो गया है। युद्ध की शुरुआत में ईरान के शासन को खत्म करने और उसकी सैन्य क्षमता को पूरी तरह नष्ट करने का दावा किया गया था। लेकिन ईरान की सत्ता और सैन्य ढांचा अब भी कायम है। ऐसे में सवाल उठता है कि युद्धविराम के बावजूद इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के घोषित दावे क्या जमीन पर खरे उतरे?


Editorial Desk✍️

पांच सप्ताह तक चले अमेरिका-ईरान सैन्य टकराव के बाद आखिरकार युद्धविराम लागू हो गया है, जिसे इसराइल ने भी समर्थन दिया है।
हालांकि, इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के शुरुआती आक्रामक रुख और किए गए दावों की तुलना में इस युद्धविराम के मायनों क्या हैं।
युद्ध की शुरुआत में जहां नेतन्याहू ने ईरान के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई और उसके शासन को समाप्त करने का दावा किया था। वहीं अब युद्धविराम को लेकर उनके कार्यालय की ओर से जारी बयान अपेक्षाकृत नरम दिखा।
युद्धविराम का अंतिम निर्णय मुख्य रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पहल पर लिया गया।
लेकिन अमेरिका और ईरान दोनों ने इस संघर्ष के बाद जीत का दावा किया है।
लेकिन विशेषज्ञों में दोनों के दावों में स्पष्ट विरोधाभास नज़र आता है।


युद्ध के नतीजों पर अलग-अलग दावे


अमेरिका और ईरान, दोनों ही पक्षों ने इस पांच सप्ताह लंबे संघर्ष को अपनी-अपनी जीत बताया है।
इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने भी अपने संबोधन में इस सैन्य अभियान को सफल करार दिया, लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह युद्धविराम अंतिम नहीं है।
उनके अनुसार, इसराइल के पास अभी कई रणनीतिक लक्ष्य बाकी हैं, जिन्हें या तो कूटनीतिक समझौतों के ज़रिए या फिर दोबारा सैन्य कार्रवाई करके हासिल किया जाएगा।
हालांकि, ज़मीन पर हालात कुछ और ही कहानी बयान करते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की जिस सैन्य ताकत को बरबाद करने का दावा प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने किया था, वह गलत साबित हुआ।
ईरान की सैन्य ताकत के साथ वहां की मौजूदा सत्ता भी कायम है।
भले ही इस संघर्ष में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई और अन्य शीर्ष नेताओं की जन गई हो, लेकिन इससे ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में कोई निर्णायक बदलाव नहीं आया है।


परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल खतरा बरकरार


इस पूरे संघर्ष के दौरान एक बड़ा मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम और उसके पास मौजूद संवर्धित यूरेनियम का भंडार रहा। हालांकि इसराइल और अमेरिका ने दावा किया है कि उन्होंने ईरान की कई परमाणु और मिसाइल उत्पादन सुविधाओं को नुकसान पहुंचाया है।


लेकिन अभी तक ईरान की तरफ से कोई आधिकार पुष्टि हुई हुई कि उसकी परमाणु क्षमता कमज़ोर हुई भी या नहीं।
वैसे युद्धविराम की घोषणा के बाद भी तनाव कम नहीं हुआ। अंतरराष्ट्रीय मीडिया के अनुसार यरूशलम में मिसाइल अलर्ट जारी किए गए और कई धमाकों की आवाजें सुनी गईं। इसराइली डिफेंस फोर्स (आईडीएफ) के अनुसार, ईरान की ओर से कई मिसाइलें दागी गई थीं। इससे यह साफ हो जाता है कि युद्धविराम के बावजूद स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में नहीं है।


नेतन्याहू की रणनीति पर सवाल


राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेतन्याहू ने इस युद्ध में ईरान की सैन्य ताकत और उसकी राजनीतिक स्थिरता का गलत आकलन किया।
इसराइल के वरिष्ठ पत्रकार एंशेल फेफर के अनुसार, नेतन्याहू ने शुरुआत में केवल युद्ध को “रोकने” की बात की थी, लेकिन उन्होंने कभी यह स्वीकार नहीं किया कि युद्ध पूरी तरह खत्म हो गया है।
उन्होंने यह भी कहा कि अपने घोषित लक्ष्यों को हासिल न कर पाना नेतन्याहू के लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदायक हो सकता है।

एंशेल फेफर ने ये भी कहा कि “अगर अमेरिका ने इसराइल की राय के बिना युद्धविराम का फैसला किया है, तो भविष्य में इससे दोनों देशों के बीच मतभेद भी उभर सकते हैं।”
हालांकि फिलहाल ट्रंप और नेतन्याहू के बीच सार्वजनिक तौर पर एकजुटता दिखाई दे रही है, लेकिन रणनीतिक स्तर पर उनके लक्ष्यों में अंतर स्पष्ट होता जा रहा है।


इसराइल: विपक्ष का हमला और चुनावी असर


इसराइल के विपक्षी नेता येर लापिड ने इस पूरे घटनाक्रम को देश के इतिहास की “सबसे बड़ी राजनीतिक विफलता” बताया है।
उनका कहना है कि जब राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े इतने बड़े फैसले लिए जा रहे थे, तब इसराइल को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया गया।
लापिड ने नेतन्याहू पर निशाना साधते हुए कहते हैं कि “सेना और जनता ने अपना काम बखूबी किया, लेकिन प्रधानमंत्री राजनीतिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर विफल रहे। उन्होंने आरोप लगाया कि नेतन्याहू अपने किसी भी घोषित लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाए।”
यही नहीं नेतन्याहू की गठबंधन सरकार के भीतर भी असंतोष के संकेत मिल रहे हैं, खासकर उन दक्षिणपंथी सहयोगियों से जो युद्धविराम के खिलाफ हैं।
इस साल इसराइल में चुनाव होने हैं, ऐसे में यह मुद्दा नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति को कमज़ोर कर सकता है।


विशेषज्ञों की राय: आंशिक सफलता, अधूरी जीत


अमेरिका स्थित आरएएनडी कॉरपोरेशन की विशेषज्ञ शिरा एफ़्रॉन का कहना है कि नेतन्याहू ने इसराइली जनता से वादा किया था कि यह अभियान ईरान के इस्लामी शासन का अंत कर देगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
उन्होंने कहा कि यह स्थिति “हाइड्रा” जैसी हो गई है, यानी एक समस्या खत्म करने की कोशिश में कई नई चुनौतियां पैदा हो गई हैं। ऐसे में इसराइल के लिए यह स्वीकार करना मुश्किल हो रहा है कि ईरान का खतरा अभी भी बना हुआ है।
वहीं, इसराइली सैन्य खुफिया विभाग के पूर्व अधिकारी योसी कुपरवासर का मानना है कि इस युद्ध में कुछ व्यावहारिक लक्ष्य जरूर हासिल किए गए हैं। उनके अनुसार, ईरान की सैन्य क्षमताओं और नेतृत्व को काफी नुकसान पहुंचाया गया है, लेकिन वे यह भी मानते हैं कि शासन परिवर्तन और परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने जैसे बड़े लक्ष्य पूरे नहीं हो सके।

लेबनान मोर्चे पर बढ़ता संकट


युद्धविराम को लेकर सबसे बड़ा विवाद लेबनान को लेकर सामने आया है। ईरान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने दावा किया है कि युद्धविराम समझौते में लेबनान भी शामिल है, जहां इसराइल ईरान समर्थित संगठन हिज़बुल्लाह से लड़ रहा है।
हालांकि, नेतन्याहू के कार्यालय और इसराइली सेना ने स्पष्ट किया है कि लेबनान इस समझौते का हिस्सा नहीं है। इसके बाद इसराइल ने लेबनान में बड़े पैमाने पर हमले किए, जिन्हें हाल के महीनों का सबसे बड़ा हमला बताया जा रहा है।
लेबनान सरकार के अनुसार, इन हमलों में 182 लोगों की मौत और 890 लोग घायल हुए हैं। इस स्थिति ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है।
अमेरिका ने भी साफ किया है कि लेबनान को लेकर अलग से बातचीत जारी रहेगी। वहीं, ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने चेतावनी दी है कि अगर इसराइल ने लेबनान में कार्रवाई नहीं रोकी, तो उसे कड़ा जवाब दिया जाएगा।


क्षेत्रीय तनाव और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया


इस पूरे घटनाक्रम ने मध्य पूर्व में तनाव को और बढ़ा दिया है। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और कनाडा जैसे देशों ने मांग की है कि युद्धविराम को लेबनान तक भी लागू किया जाए।
लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ औन ने इसराइल पर अंतरराष्ट्रीय कानूनों की अनदेखी करने का आरोप लगाया है। वहीं, इसराइल का कहना है कि वह दक्षिणी लेबनान में “सुरक्षा बफर जोन” बनाने के लिए कार्रवाई जारी रखेगा।
इस कार्रवाई के चलते लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं और क्षेत्र में मानवीय संकट गहराता जा रहा है।


आगे की राह: अनिश्चित भविष्य


अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आगे इसराइल और अमेरिका का रुख क्या होगा। क्या नेतन्याहू युद्धविराम को स्थायी रूप देंगे या फिर अधूरे लक्ष्यों को हासिल करने के लिए दोबारा सैन्य कार्रवाई का रास्ता अपनाएंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
इसके साथ ही, यह भी देखना महत्वपूर्ण होगा कि डोनाल्ड ट्रंप इस पूरे मामले में आगे क्या भूमिका निभाते हैं। दोनों नेताओं के बीच तालमेल ही इस युद्धविराम के भविष्य को तय करेगा।
फिलहाल, युद्धविराम लागू जरूर हो गया है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि संघर्ष पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ईरान की क्षमताएं अभी भी बनी हुई हैं, लेबनान में तनाव जारी है और इसराइल के अंदर राजनीतिक अस्थिरता बढ़ रही है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि यह युद्धविराम एक ठहराव है, न कि स्थायी शांति का संकेत।