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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव राजनीतिक वर्चस्व और अस्तित्व की जंग

पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव सिर्फ वोटों की लड़ाई नहीं, बल्कि राजनीतिक वर्चस्व और अस्तित्व की जंग बन चुका है। एक तरफ ममता बनर्जी के लिए सत्ता बचाने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ BJP है, जो नए किले फतह करने की महत्वाकांक्षा के साथ मैदान में है।

Desk ✍️

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव एक तरफ ममता बनर्जी के लिए सत्ता में बने रहने हेतु वर्चस्व बनाए रखने की लड़ाई है, तो दूसरी तरफ भाजपा के लिए अस्तित्व कायम करने की एक कोशिश। 

चार दशक से ज़्यादा की राजनीतिक यात्रा और 2011 में ऐतिहासिक जीत के बाद ममता बनर्जी ने खुद को ‘जनता की दीदी’ के रूप में स्थापित किया है।


इस दौरान उनकी योजनाएं—लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री और स्वास्थ्य साथी—उनकी ताकत बनीं।

लेकिन कुछ मामलों को सुर्खियां मिलने के बाद भ्रष्टाचार की आंच व महिला सुरक्षा के मुद्दों से उपजे जन असंतोष ने यदाकदा उनके लिए मुश्किलें भी खड़ी की हैं। 

जिसका राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद बीते 15 साल से लगातार सत्ता में रहने वाली दीदी पर असर दिखाई देता नहीं हैं.

लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का एक गुट मानता है कि उन तमाम मुद्दों को ध्यान में रखते हुए यह चुनावी लड़ाई TMC के लिए इतनी आसान नहीं है.

ममता इतनी मजबूत क्यों हैं?

ममता बनर्जी लंबे समय से आम लोगों के बीच मुख्यमंत्री के बजाय दीदी के तौर पर अपनी पहचान बनाने का प्रयास करती रही हैं. 

नतीजतन महिला मुख्यमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल, जनसंपर्क औऱ लड़ाकू नेता की छवि ने आम लोगों में उनकी अलग पहचान बनाई है. 

वह बार-बार कहती रही हैं कि “तृणमूल कांग्रेस संगठन की नींव मज़बूत करने के लिए वह कड़े फैसले लेने से भी नहीं हिचकेंगी.”

वास्तव में कभी NDA का हिस्सा रही उनकी पार्टी TMC वर्तमान में भाजपा के ख़िलाफ़ लगातार मुखर रही है. 

ममता बंगाल के प्रति केंद्र की उपेक्षा के मुद्दे पर सक्रिय रही हैं. इसके साथ ही वह लगातार आरोप लगाती रही हैं कि देश के विभिन्न राज्यों में बांग्ला बोलने वालों को बांग्लादेशी करार दिया जा रहा है.

SIR का असर: क्या बंगाल में बदलेगा चुनावी बाज़ी?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में अबतक Mamata Banerjee की अगुवाई वाली All India Trinamool Congress मज़बूत नज़र आती रही है, लेकिन SIR के बाद जारी ज़मीनी आंकड़े कुछ अलग ही कहानी बयान कहते हैं।

दरअसल विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद जो डेटा सामने आया है, उसने चुनावी समीकरण को और जटिल बना दिया है—और कहीं न कहीं Bharatiya Janata Party के लिए नए मौके भी खोल दिए हैं।


मतदाता सूची में बड़ा फेरबदल: 91 लाख नाम हटे

SIR के तहत करीब 91 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए, जिनमें से लगभग 60% सिर्फ 6 मुस्लिम बाहुल्य जिलों से हैं:

  • मालदा
  • मुर्शिदाबाद
  • उत्तर दिनाजपुर
  • नदिया
  • उत्तर 24 परगना
  • दक्षिण 24 परगना

महत्वपूर्ण बात ये है कि 2021 विधानसभा चुनाव में इन 6 ज़िलों की 115 में से 93 सीटें यानी (81%) TMC के पास हैं।
जिस सका सीधा मतलब:

  • पारंपरिक वोट बैंक में बदलाव
  • पुराने जीत के मार्जिन अब भरोसेमंद नहीं
  • कई सीटों पर मुकाबला बेहद करीबी हो सकता हैं।

वोट शेयर का गणित: TMC मज़बूत, लेकिन सीमित प्रभाव

आंकड़े बताते हैं:

  • TMC का वोट शेयर बड़ा है, लेकिन कुछ खास क्षेत्रों में केंद्रित
  • खासकर मुस्लिम बहुल सीटों पर भारी जीत → “अतिरिक्त वोट” बनते हैं

ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि ये अतिरिक्त वोट अन्य सीटों पर TMC के लिए कैसे फायदेमंद होंगे?


‘वेस्टेड वोट’ का खेल: किसका नुकसान ज़्यादा?

2024 के आंकड़ों के अनुसार:

पार्टीवेस्टेड वोट (10%+ मार्जिन)
TMC55.8 लाख
BJP11.9 लाख

लेकिन 2021 में यह अंतर और बड़ा था:

  • TMC: 65 लाख

महत्वपूर्ण बात ये है कि:
TMC के आधे से ज़्यादा वेस्टेड वोट मुस्लिम बहुल सीटों से आते हैं, तो सवाल ये है कि वेस्टड वोट का प्रभाव होने वाले चुनाव में कैसे पड़ेगा?


मतुआ बेल्ट क्या BJP की दोहरी चुनौती?

पश्चिम बंगाल के उन सीमावर्ती ज़िलों और क्षेत्रों को मतुआ बेल्ट कहा जाता है जहाँ मतुआ समुदाय की घनी आबादी है। इनमें प्रमुख ज़िले उत्तर 24 परगना, नदिया, हावड़ा, कूचबिहार और मालदा हैं।

यह समुदाय मूल रूप से पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से आए नमशूद्र (Namasudra) दलित हिंदुओं का है, जो धार्मिक उत्पीड़न और विभाजन के कारण कभी भारत आए थे।

इस क्षेत्र में नागरिकता (CAA) सबसे बड़ा मुद्दा है, क्योंकि मतुआ समुदाय के विभिन्न लोगों के पास अभी भी स्थायी नागरिकता के पुख्ता दस्तावेज़ नहीं हैं। 

मतुआ का प्रभाव पश्चिम बंगाल की 55 विधानसभा सीटों और 7 लोकसभा सीटों पर निर्णायक माना जाता है। 

मतुआ बेल्ट (55 सीटें) → बड़े पैमाने पर नाम हटने से BJP को नुकसान की आशंका है।

जबकि उत्तर बंगाल और जंगलमहल ऐसा क्षेत्र है जहां BJP मज़बूत है, लेकिन यहां कटौती कम हुई है 

ऐसे में सवाल ये है कि “घुसपैठ और फर्जी वोट” हटाने का मुद्दा मतुआ बेल्ट में घटे वोटर की तुलना में उत्तर बंगाल की संभावित बढ़त से क्या बीजेपी नुकसान की भरपाई कर पाएगी?


मोदी-शाह की जोड़ी और मिशन बंगाल

भाजपा इस चुनाव को बड़े मौके के रूप में देख रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और अमित शाह की रणनीति के सहारे पार्टी बंगाल में अपनी पकड़ मज़बूत करना चाहती है।
घुसपैठ, भ्रष्टाचार और केंद्र की योजनाओं को मुद्दा बनाकर भाजपा लगातार हमला करने का प्रयास कर रही है।

हालांकि, सांस्कृतिक अस्मिता और मतदाता सूची विवाद जैसे मुद्दे अब बीजेपी के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं।

अपने मकसद में कामयाब होने के लिए BJP ने शुभेंदु अधिकारी के तौर पर एक टक्कर का चेहरा तलाश, लेकिन सवाल ये है कि शुभेंदु भाजपा को कितनी सफलता दिलवा सकेंगे?

बहरहाल कभी ममता के करीबी रहे शुभेंदु अधिकारी अब भाजपा के sabse बड़े हथियार हैं। 

पीछे चुनाव में नंदीग्राम सीट से दीदी को हराना, शुभेंदु को खास बनाता है। उस जीत को न भूलने वाले शुभेंदु इस बार वह भवानीपुर से भी दीदी को चुनौती दे रहे हैं।


उनकी आक्रामक राजनीति जहां भाजपा को ताकत देती है, वहीं ध्रुवीकरण के आरोप उनकी छवि पर सवाल भी उठाते हैं।


अभिषेक बनर्जी: नई पीढ़ी का चेहरा

तृणमूल कांग्रेस के युवा नेता अभिषेक बनर्जी चुनाव नहीं लड़ रहे, लेकिन रणनीति से लेकर संगठन तक उनकी मजबूत पकड़ है।
उनकी साफ-सुथरी छवि और आधुनिक अप्रोच पार्टी को नई दिशा दे रही है।
हालांकि, विपक्ष उनके खिलाफ परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर घेरने की कोशिश कर रहा है।

एंटी-इंकम्बेंसी: TMC की 15 साल की सत्ता पर सवाल

लगातार 15 साल से सत्ता में रहने के कारण Mamata Banerjee सरकार के खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी भी क्या एक बड़ा फैक्टर बन है?

सीधे शब्दों में पूछा जाए तो क्या स्थानीय असंतोष, संगठनात्मक थकान और नए मतदाताओं का आगमन क्या बीजेपी को लाभ पहुंचा सकेगा?

इस सवाल पर पश्चिम बंगाल के राजनीतिक समीकरणों पर नज़र रखने वाले पत्रकार शाहनवाज़ का मानना है कि ये बहुत मुश्किल है। वह कहते हैं कि “BJP के पास जन जन तक पहुंचने वाले बंगला भाषी कार्यकर्ता नहीं हैं, जबकि TMC इस मामले में BJP से बहुत आगे है, यही मूल अंतर चुनाव का परिणाम तय करेगा।